उर्मिला सिदार की कृत आलेख- इच्छा और कर्म में भेद
कवि-उर्मिला सिदार
जिला-रायगढ़
राज्य-छत्तीसगढ़
विधा-गद्य
शीर्षक-इच्छा और कर्म में भेद
संपर्क-9303298994
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इस संसार में हर जड़ चेतन ले इकाइयां क्रियाशील है यह प्रकृति कि विधान है।मनुष्य भी जड़- चैतन्य सह अस्तित्व स्वरूप मे क्रियाशील है।कर्म शरीर करता है।इच्छा मन (जीवन)करता है।मन भी क्रिया करता है ,शरीर भी क्रिया मन के आदेश अनुसार करता है। दोनो अलग होते हुए भी साथ- साथ मानव स्वरुप मे है। शरीर के बिना जीवन अधूरा मन के बिना शरीर अधूरा ,दोनों एक दूसरे के पूरक है।
जीवन सोच ,विचार ,समझने कि क्रिया करता है।शरीर अंको से भौतिक वस्तु के लिए क्रिया करता है।
दोनों कर्म करते हैं एक समझ में का और शरीर शरीर के लिए भौतिक वस्तु का कार्य करता है दोनों में यही भेद है।इच्छा करने से मनुष्य मे कर्म का लेप नही होता का तात्पर्य है। इच्छा जीवन(मन) की क्रिया है।इसीलिए मनको भौतिक वस्तु की लेप नही लगता, मन को समझ (ज्ञान) की आवश्यकता होती है, न की भौतिक वस्तुओं की।जीने की इच्छा तो निरंतर होती है ,लेकिन शरीर के बिना व्यक्त नही होता।यही मानव के लिए विधान है।मानव को शरीर और जीवन(मन) दोनो चाहिए। तभी मानव जिंदा रह पाएगा यही नियति नीति है विधान है।
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उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़
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