Friday, October 14, 2022

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की कृति आलेख- पोषण(पुण्य), शोषण(पाप)

रचयिता -श्रीमती उर्मिला सिदार
जिला- रायगढ़ 
राज्य- छत्तीसगढ़
 विधा- गद्य 
शीर्षक- पोषण (पुण्य) शोषण (पाप)
संपर्क- 930 32 98 994 व्हाट्सएप नंबर -99 8101 7474
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*पोषण (पुण्य)शोषण (पाप)*
सर्वत्र व्याप्त परमपिता परमेश्वर में समाहित यह जड़ -चैतन्य अनंत गोल ग्रह ,उप ग्रह, नक्षत्र, पिण्ड, अणु, परमाणु संचालित है। पृथ्वी ग्रह में समस्त संसार जैसे- पदार्थ संसार, वनस्पति संसार ,जीव संसार, मानव कुल संसार, विद्यमान है। स्वस्फूर्त  स्वचालित है। स्वचालित का मूल आधार (मूल ऊर्जा)परमात्मा है। इस प्रकृति का संचालन परस्परता में उपयोगिता पूरकता के अर्थ में ,पोषण विधि से विकास क्रम में हो रहा है। प्रकृति में कहीं शोषण नहीं है ,लालच (प्रलोभन) नहीं है। सभी संसार अपने दायित्व- कर्तव्य का निर्वहन कर निश्चित आचरण के साथ व्यवस्थित है और बड़ी व्यवस्था में भागीदारी कर समाधानित है। प्रकृति में भय प्रलोभन नहीं है। केवल मानव में भय प्रलोभन, बिना जाने मानकर जीने की प्रवृत्ति बना हुआ है। यही पाप (समस्या) = दुःख है। मानव की नासमझ व्यवहार कार्य करना ही दुःख का कारण है ।जो अमानवीता व्यहार से प्रसवित होता है। अमानवीयता का परंपरा नहीं है। जब तक ना समझ कर कार्य करते हैं।तो कार्यों में गलतियों के कारण कार्य सफल नहीं होता और हम जैसा चाहते हैं, वैसा नहीं हो पाता, यही पाप है ,समस्या है ,दुःख है। शोषण पाप है अर्थात प्रलोभन वस दूसरों का शोषण कर खुद शोषित होते हैं ।ह्रास की ओर गति करते हैं। अतः हर मानव को शोषण नहीं पोषण के अर्थ में अनुभव, विचार, व्यवहार ,कार्य करना चाहिए। जिसके फलन में समाधान (सुख) की प्राप्ति है। यह संसार पोषण के अर्थ में उद्भवित है न कि शोषण के अर्थ में ,नासमझ के कारण हमारी प्रवृत्ति वर्तमान में ज्यादातर शोषण की ओर गतित है। अतः सभी की पोषणीयता बना रहे, ऐसी व्यवहार -कार्य करना चाहिए। यही मनुष्य की मनुष्यता है ,जो सभी के लिए शुभकारी है,उपकारी है। 
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उर्मिला सिदार बुलाँकी  रायगढ़ छत्तीसगढ़

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