रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-आना तुम मेरे पास प्रिये|
विधा-मुक्त छंद
सांझ -सा उम्र जब ढलने लगे,
मन पंछी की तरह तड़पने लगे|
अपने बेगाने बन भड़कने लगें,
तब तुम आना मेरे पास प्रिये|
सिंदूरी शाम जब दहकने लगे,
पंछी पेड़ों पर यूं चहकने लगें|
मन यूं अचानक बहकने लगे,
तब आना तुम मेरे पास प्रिये||
सपनों की बगिया झुलसने लगे,
ठोकरें खा मन जब भटकने लगे|
प्रेम के बोल को मन तड़पने लगे|
तब आना तुम मेरे पास प्रिये||
मन का कोई कोना झुलसने लगे,
अपनों के लिए मन तरसने लगे|
आंखों से अश्रु धार बरसने लगे,
तब आना तुम मेरे पास प्रिये||
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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