रचनाकार-अमिताभ कुमार दीवान
जिला-रायपुर
विषय-सोलह श्रृंगार
विधा - कविता
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एक ये भी राग था, एक ये भी बात थी|
दिन तो वही थे, रात बस उदास थी|
कहती थी मुझसे बहुत कुछ,
अब ना जाने सोचती है क्या|
इसमे लगती हूँ अच्छी या खास इसमें लगतीहूँ क्या?
कहता था अक्सर मैं भी, पीली सी ये साड़ी नई खरीदी है क्या
लाल लाल साड़ी से, ये कुछ दब सी गयी है क्या
रँग नीला है या है ये लाल ,वो कहती महरून
मैं कहता ये है नीला, इसे महरून बोलते हैं क्या?
वो गुस्साती ,कहती ये है महरून ,नीला है लापता
महरून और नीला में तुम्हें अंतर भी नहीं पता|
बताती थी सारे किस्से ,वो सब थे मेरे हिस्से
कुछ तो कमी है क्यों बात वो नही है
बाहों में कपड़ों की सिलवट में कुछ तो कमी है
मैं कहता था उसको इस बार का दर्जी फर्जी निकला क्या
क्यों इस बार कपड़ो की फीटिंग सही नही है
पूछता था मैं, यही सोलह श्रृंगार है क्या
हुए पूरे सोलह ,जरा गिनके तू बता
गिनाती थी मुझको जब भी,उसकी गिनती बिगड़ जाती थी|
उसकी गिनती कभी भी चौदह से ऊपर ना जाती थी|
कहता था मैं उससे, ये सोलह कहाँ हुआ|
बचे हुए दो के अब नाम तो बता|
गिनती थी फिर से वो भी, पूरे पूरे हिसाब
अठारह हो जाते थे, अब उसके सोलह श्रृंगार
हँसती थी खिलखिलाकर, अब गिनु तो गिनु मैं क्या
मैं चुपके से गिन लेता था, उसके पूरे सोलह दाँत|
सोचता था कहूँ उससे, यही है सोलह श्रृंगार|
जिम्मेदारियों का बस, यही सबब है|
छोटी खुशियाँ छीन लेती है, ये बेसबब है|
अमिताभ कुमार दीवान
रायपुर
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