जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-प्रहरी
विधा- कविता (मुक्त छंद)
तुम हो समाज के प्रहरी,
कभी अन्याय न होने देना|
हर मजबूर को न्याय मिले,
ऐसी ही पत्रकारिता करना||
कलम के हो तुम सिपाही,
कभी भी नही तुम डरना|
कलम तुम्हारी तलवार है,
बेड़ियां काटते हुए चलना||
तुम हो चौथे स्तंभ राष्ट्र के,
गद्दारी कहीं न होने देना|
गर्वित हो देश का सीना,
प्रहरी ऐसा सदा ही रहना||
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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