जिला - रायपुर
विषय-प्रहरी
विधा-कविता
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जैसे जैसे उसके दुखों से, साक्षात्कार हो रहा था|
मुझे ऐसा लगता था जैसे मुझे उससे प्यार हो रहा था|
मेरी आँखें उसकी बातें जानने को बेचैन रहती,
सुबह दोपहर शाम उसका इन्तेजार हो रहा था|
मुझसे बात करते करते, उसका गला रुंध सा जाता,
मेरी आँखों में अक्सर, आँसुओ का संचार हो रहा था|
कुछ ढाँढस के शब्द, मैं बड़ी मुश्किल से ढूँढ़ पाता था,
जुबान खुलती जरूर थी ,मन एकाकार हो रहा था|
मैं सोचता था कहूँ, आ तेरे आँसू पोंछु, गले से लगा लूँ,
कैसा तुझपर इस कमबख्त वक्त का प्रहार हो रहा था|
प्रहरी की तरह खड़ा मैं ,वो पहर की तरह गुजर रही थी,
मैं उसके दरवाजे में खड़ा उसका इन्तेजार कर रहा था|
अमिताभ कुमार दीवान
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