जिला - बलौदाबाजार
विषय - प्रवाह
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - प्रवाह
*****************************
// प्रवाह //
पानी का प्रवाह तो दिखता है
किन्तु
समय और जीवन का प्रवाह
परोक्ष होता है ।
विचार और अनुभव से
कुछ - कुछ
पकड़ में आता है ।
काम क्रोध लोभ राग द्वेष
ऐसे ही विकारी प्रवाह है
जो हमे बहा ले जाती है ।
वासना इच्छा प्रलोभन आदि
मानसिक व बौद्धिक प्रवाह
हमारे जीवन मे बहती रहती है ।
तो हमे
इन निषेधात्मक व अवांछनीय
प्रवाहों की बजाय
भक्ति ज्ञान प्रेम दया करुणा
परोपकार उदारता समता
निर्भयता प्रसन्नता सहजता
सत्यता शुचिता मुक्तता जैसे
वांछनीय व सकारात्मक
सात्विक भावों के प्रवाह मे
निरंतर बहते जाना चाहिए ।
यही जीवन की सफलता है
और
इसी में समझदारी है ,
होशियारी है और
बड़प्पन व बहादुरी है ।
---#---#---#---
No comments:
Post a Comment