सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय- बदहाली
राहतों की बात ना पूछो
आहतों से पीड़ित है देश मेरा
किस आवरण से ढंक दूँ
अनवरत बहते अश्कों को
कल तक खुशियों के मेले थे
अब चिताओं की कतार लगी है
ना सुकून की मौत मिल रही
ना सम्मान की अंतिम विदाई है
गंगा भी आज मजबूर रो रही
सीने में अपने बच्चों को लिए दर-दर भटक रही
बेबसी, बदकिस्मती का हाल ना पूछो
हाहाकार सी मची है चारों ओर
तूफानों,झंझावातों का दौर है ये
अंदर -बाहर सब कुछ बह रहा
देख उठती लहरें सागर की
विचलित धरा भी मानो कांप रही
डरा,सहमा मानव भी अब
अंबर को, आशाओं से ताक रहा
ऊपरवाले पे ही भरोसा है अब
अपने दुआओं पे असर मांग रहा
राहतों की बात ना पूछो
आहतों से पीड़ित है देश मेंरा।।
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