Monday, May 31, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- प्रहरी

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - प्रहरी

              प्रहरी
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हिमालय सा अडिग खड़ा है ,
देश का हर सिपाही ,
बाँधे कफ़न सिर अग्निपथ पर ,
नित चलता वो राही ,
सिंधु सा तूफान लिए ,
चट्टानों से टकराने ,
मौजों की गर्दिश से लड़ते ,
बढ़ते आगे परवाने ,
क्षत -विक्षत हो छाती फिर भी ,
आत्म बल न कम होता ,
अपनी जान गंवाने तैयार ,
आँखें फिर भी न हम होता ,
वज्र का सीना लिए वीर ,
उत्साही बढ़ता है आगे ,
हुंकार सुने जब शेरों की ,
दुश्मन दुम दबाकर भागे ,
गंभीर घोष रणभेरी सा ,
नायक भरता जवानों में ,
भारतमाता की जयकारें ,
गूँजा करती हर कानों में ,
धड़ -धड़ ,धड़- धड़ चलती गोलियां,
पिंडली -पुट्ठे से टकराती ,
राष्ट्रभक्ति का नया सबब ,
जन-जन-जन को सिखलाती ,
अमरत्व प्रदान करता मरना उनका ,
जो बैरी पर तन जाता है ,
तोपों से , बम धमाकों से प्रहरी ,
चीर यौवन बन जाता है ,
इनके त्याग, परिश्रम- बल से ,
सजी हिन्द की गौरवगाथा ,
धन्य -धन्य है इन लालों से ,
जय -जय-जय हो भारतमाता ,

         - - शैलेन्द्र चेलक - -

2 comments:

  1. देशभक्ति से ओतप्रोत,भारत के जवानों और युवा वर्ग को समर्पित अत्यंत सुंदर कविता।

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  2. धन्यवाद महोदय

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