पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
शीर्षक - चिता की राह
विधा - गज़ल
चिता की राह
---------------------------------- -----
चिता यूं तो एक दिन ,जिस्म को जलाती है ,
पर जिंदा कौन है यहाँ ? दिलों में राख लिए हुए ,
सुलगता है पल - पल तू अपनी साख बचाने को ,
साख की क्या औकात ? जब हो राख लिए हुए ,
यूं अश्क़ बहाना शख्सियत नही है तुम्हारा ,
पर न जाएगा तू भी हाथों में हजारों लाख लिए हुए ,
गुरुर तेरा न टूटे तो किसी का क्या जाता है ?
मुहब्बत भी न मिलेगा तीखी आँख लिए हुए ,
चिता की राह में आख़िर जीते जी बढ़ रहा है तू ,
रब के पास न जाता है कोई जमीं का धाक लिए हुए ,
नेकी से गुज़र ज़माने में , हमराह बनाके चल ,
बख्शिशे भी होगी , तब चला जाये शायद तू साख लिए हुए ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
Bhut sundar
ReplyDelete