Wednesday, May 19, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- चिता की राह

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
शीर्षक - चिता की राह
विधा - गज़ल

       चिता की राह 
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चिता यूं तो एक दिन ,जिस्म को जलाती है ,
पर जिंदा कौन है यहाँ ? दिलों में राख लिए हुए ,

सुलगता है पल - पल तू अपनी साख बचाने को ,
साख की क्या औकात ? जब हो राख लिए हुए ,

यूं अश्क़ बहाना शख्सियत नही है तुम्हारा ,
पर न जाएगा तू भी हाथों में हजारों लाख लिए हुए ,

गुरुर तेरा न टूटे तो किसी का क्या जाता है ? 
मुहब्बत भी न मिलेगा तीखी आँख लिए हुए ,

चिता की राह में आख़िर जीते जी बढ़ रहा है तू ,
रब के पास न जाता है कोई जमीं का धाक लिए हुए ,

नेकी से गुज़र ज़माने में , हमराह बनाके चल ,
बख्शिशे भी होगी , तब चला जाये  शायद तू साख लिए हुए ,

     - -  शैलेन्द्र चेलक  - -

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