जिला -कांकेर,छग
शीर्षक- सिसकी
विधा-कविता (मुक्त छंद)
क्या सुनी तुमने
कराहती हुई
दुबक कर रोती
नदी की सिसकी?
कर दिया तुमने,
सड़ी-गली लाशों
का यूं ही विसर्जन !
क्या सुनी तुमने
अपहृत सैनिक के
पत्नी की सिसकी?
जिसने आज ही
खो दी ईलाज के
अभाव में मासूम
दूधमुँही बच्ची!
क्या सुनी तुमने
रोड़ पर बिलखती
माँ की सिसकी?
जिसके करोना से
मृत बच्चे की दोनों
आँख निकाले गये
बिना बताये ही !
क्या सुनी तुमने
उन अबोध नन्हें
बच्चों की सिसकी?
जिनके माँ- पिता
दोनों गुजर गये
करोना के दंश से
कल असमय ही!
क्यों कराहता नहीं
कहर देख कर यूं
तुम्हारा हृदय?
धूं-धूं जलते लाशों
का ढ़ेर देख कर
क्यों सिसकी नहीं
भरता तुम्हारा मन?
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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