जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-सन्नाटा
विधा-कविता (मुक्त छंद)
पसरा हुआ सन्नाटा कह रहा
अनकही कहानी|
कितना खौफनाक हवा है,
जहरीला पानी||
शाख से टूट चुकी अनगिनत
कलियां बेचारी,
अधखिली ही तो थीं कैसी ये
उनकी लाचारी|
बेबसी थी रो भी न सके अपनों
से बिछड़ कर,
कायनात ही सिहर उठी मंजर
को देखकर|
आओ बची हुई धरती को हम फिर संवारें|
मन के बुझे हुये चिराग को हम
अब जलायें||
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
अतिसुंदर कविता।
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