सुंदरगढ़, ओड़िसा
विधा-आलेख
विषय-शून्य होती संवेदना.....
आज के परिदृश्य में काफी कुछ बदलाव हो रहा है। हमारे जीने के ढंग अब पहले जैसे नही रहा मनुष्य सदा से एक सामाजिक प्राणी रहा है लेकिन इस महामारी के डर से या सोशल डिस्टेसिंग के नाम पर वो एक दूसरे से दूर होते जा रहा है।
माना आज ये आवश्यक है पर धीरे-धीरे हमारी संवेदना भी शून्य होती जा रही है और ये सच मे डरने वाली बात है कभी अपनी जान बचाने के लिए ,तो कभी रोज -रोज लोगों के मरने की खबर सुनकर मनुष्य असंवेदनशील होते जा रहा है डर है आने वाले समय में किसी के भी मृत्यु पर मनुष्य में संवेदना ही ना जागे ।पहले अपने तो क्या किसी जानने वाले कि मृत्यु पर भी हफ़्तों तक दुख महसूस होता था अब हालात ऐसे हैं कि पूरा परिवार के परिवार उजड़ जा रहे हैं पर हम मूक दर्शक बने बैठे हैं चाहे तो भी कुछ कर नही पा रहे और अपनी खैरियत पर ही संतुष्ट है।अगर किसी की मौत भी हमें द्रवित ना करे तो......
ये वायरस भले ज्यादा समय ना रहे परन्तु अगर मानव मन में ये सदा के लिए असंवेदना का वायरस भर गया तो हममे और अन्य जीव -जंतुओं में फर्क ही क्या रह जायेगा।
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