जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - भजन
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - मैं हो गया वीरान
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// मैं हो गया वीरान //
दुनिया के झमेले ने मुझे कर दिया परेशान ।
देखते ही देखते मैं हो गया वीरान ।।
कुछ भी न करते बन पड़ा माया की फेर में ।
भटक रहा हूँ आज मैं जीवन - अंधेर में ।।
जन्मों से मुझे जकड़ा है क्लेश और अज्ञान ।
देखते ही देखते.......।।१।।
विषयों की लालसा ने मुझे कर दी है पागल ।
मरता रहा सुख के लिए दिन - रात हो चंचल ।।
सिर पाप की गठरी है और उर में अभिमान ।
देखते ही देखते......।।२।।
पैसे की मधुर चाहत और लोक बड़ाई ।
पेट को भरता रहा करके बुरी कमाई ।।
नित टेढ़ी चाल चलकर निज को किया बदनाम ।
देखते ही देखते......।।३।।
आया न कभी मन में साधन भजन तुम्हारी ।
बस नीच स्वार्थ के लिए खो दिया उम्र सारी ।।
पछता रहा हूँ मेरा कैसे होवे कल्याण ?
देखते ही देखते.....।।४।।
खुल गई है आँख आज रो रहा हूँ मैं ।
मन मैल को आँसू से नित धो रहा हूँ मैं ।।
हे प्रभो ! शरणागत हूँ दो अभय वरदान ।
देखते ही देखते......।।५।।
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