जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- मोह
विधा-संस्मरण
जाने क्यों ?मेरे बाबूजी ने मेरा नाम नाम मीरा रखा| बचपन से ही मुझे भी बाल कृष्ण से आशक्ति है| मेरी कम्पास से लेकर बहुत -सी चीजें कृष्ण के चित्र युक्त हुआ करती थी|
जब मैं कालेज में पढ़ती थी,मेरी सहेली पुष्पा के साथ शापिंग के लिए घुमणमल के दुकान में अकसर जाती| दुकान वाले अंकल कहते ,अपनी सहेली से कुछ तो सीखो|कुछ तो खरीदो|मैं चुप रहती|एक दिन मैंने पूछा-अंकल! ये मूर्ति कितने की है?
दो सौ साठ रुपये|ये मूर्ति आप किसी को मत बेचना|कल मैं इसे ले जाऊंगी| किसे मना करूंगा|तुम इसे आज ही ले जाओ|मैं कृष्ण की मूर्ति घर ले आई| अगले दिन अपना गुल्लक तोड़ पैसे दे दी थी|इतना सुंदर बाल कृष्ण, घर में जो रिश्तेदार देखते कई गुने पैसे देने की बात करते|पर मैं वह मूर्ति किसी को नहीं दी|आज 29 साल हो गये,उस मूर्ति को खरीदे|आज भी उस मुस्कुराते बाल कृष्ण को देख सारी थकान भूल जाती हूँ|
मुझे उस बाल कृष्ण की मूर्ति से उतना ही मोह है,जितनी की अपनी जिंदगी से|
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
मोहन ने मेरा भी मन मोह लिया
ReplyDeleteये तो निकला बड़ा छलिया