जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-दिवा स्वप्न
विधा- कविता (मुक्त छंद)
लाशों का ढ़ेर,धूं-धूं कर जलते
चिताओं पर शमन होने लगे
मन के अरमानों के ताज|
उन्मुक्त गगन की चाह अब तो
दिवा -स्वप्न से लगने लगे हैं
करोना के तम कहर में|
आओ इन कुहासे में तलाशें हम
शेष बचे अरमानों के जुगनू,
रेगिस्तान को बाग बनाने|
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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