Friday, May 21, 2021

मीराआर्ची चौहान की रचना- माँ

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-माँ
विधा- कविता (मुक्त छंद )

कोहरे से लिपटे  पहाड़ी से
  उगते सूरज जैसी है माँ।

खेतों की मेड़ों पर घासों में,
   शबनमी बूंदों जैसी है माँ।

ठंड़े चूल्हे पर भी रोटी की
  शक्ल में भूख सेंकती है माँ।

पसरे हुए आँगन की तरह ही,
   बच्चों को निखारती है माँ।

परोसते हुए ममत्व  स्वयं  ही,
  अन्नपूर्णा बन जाती है माँ।

नहीं मिलता किसी  दुकान में,
  वात्सल्य, जो दे जाती है माँ।

पल्लू में होती है अनगिनत मंत्र,
    ऋचाएं,सचमुच भगवती है माँ।

मीराआर्ची चौहान
काँकेर,छग

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