स्थान- नौंगाँव (म.प्र.)
विधा- छंद मुक्त कविता
शीर्षक - माँ
मेरे सपनों की खातिर तूने ,
अपने सपनों का त्याग किया।
दुनिया का हर दुख भूला मैं,
तेरी गोद में आकर माँ।
जन्नत से प्यारा लगता है,
तेरे सपनों का संसार मुझे।
स्वप्न मै देखूँ सुबह शाम,
सपनों में ही खो जाऊँ।
टूटे ख्वाबों से लड़कर ही,
जीवन मेरा यथार्थ बना।
अपनी आँखों से दिखला दूँ ,
तेरे सपनों का संसार तुझे।
जब स्वप्न सच हो जाता है,
जीवन की बगिया महक उठे।
तेरे चरणों की धूल ही माँ,
मेरे सपनों का तिलक करे।
तेरी खुशियों की खातिर माँ,
अपने सपनों का बलिदान करूँ।
जीवन मेरा भी धन्य बने,
जो तेरा स्वप्न साकार करूँ।
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