*गुप्ता*
*जिला- छतरपुर म.प्र*
*विषय - जीवन का यथार्थ*
*विधा- गद्य -पद्य*
क्यों नही समझते ये बच्चे
बड़े होने के बाद....।।
जिंदगी के इस ढलती उम्र में
हमें भी सहारे की जरूरत होती है,
बचपन में जिस उँगली को थाम
तुमने चलना सीखा था,
कभी ,जिंदगी की सारी
तकलीफें, सहकर भी
तुम्हारी आँखों के
हर सपने को पूरा करने,
अपने काँधों पे बिठाकर
आँसम़ां छूने का
हौसला दिया जिसने,
हम वहीं हैं,जिसने तुम्हारी खुशियों के लिए
अपनी कई रातों की
नींदें गवाई हैं।
आज भी उन बूढ़ी आँखों में
कुछ उम्मीदें है तुमसे,
काश ,कुछ पल बैठ
हमारे साथ,बाँतें करते
हाल हमारा पूछते।
जीवन के इस
आखिरी पड़ाव में,
ये अकेलापन ......
सब कुछ, बंद मुट्ठी में,
रेत की तरह फिसलती
ये जिंदगी, पीछे छूटते
ये रिश्ते, ये टूटते बंधन।
कैसे कहें हम मन की पीड़ा
जिस घर को सींचा है,
खून से अपने,
वह पराया सा लगता है।
वो सारा अपना पन
लुटाया जिसे जी भर कर
सब पर,
वो बेगाने से लगते है,
अपने ही घर में
अनजान ,अपरिचित
बन गये है हम।
जिंदगी से दूर ,और
मौत के करब जाती
ये थमती साँसें,
बस इंतजार है..उस प्यार
और विश्वास से भरे
*दो लफ्जों का....।*
शायद यही है.....
*जीवन का यथार्थ.....।।*
जो समझ नही पाते ये बच्चे
बड़े होने के बाद.......।।।
*आशा अतुल गुप्ता*
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