जिला-रायपुर छतीसगढ़
विषय-इत्र
विधा-कविता
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ना जाने किस किस से, करार करता है|
वो बदबू है और इत्र का, व्यापार करता है|
अपनी ही सरकार है, अपनी ही नौकरशाही,
ठेके में ले लो दारू, अपना ठेकेदार करता है|
धर्म है मेरे कब्जे में ,मैं हूँ धार्मिक नेता,
बीच सड़क पर मेरा ,चकाचक बार चलता है|
मुँह से टपकता अमृत,मन में भरा जहर,
इसी से तो अपना ,कारोबार चलता है|
देखिए जनता को ,नशे में डुबोये रखिये,
जागी हुई जनता ,हुकूमत से तकरार करता है |
अब तो उल्टियाँ आती है ,सब देखकर,
अमित इत्र का अब ,तिरस्कार करता है|
अमिताभ कुमार दीवान
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