जिला - जांजगीर चाम्पा (छ ग)
विषय - चेतिका
!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!*!
जीवन में सब बटोर रहे,
बस छोड़कर जाने के लिए।
यहाँ तो आए ही हम,
एक दिन चेतिका में लेट जाने के लिए।।
फिर चेतिका से डर कैसा,
ये तो जीवन की सच्चाई है।
हमनें क्या खोया और क्या पाया,
यहीं जिन्दगी की गहराई है।।
खाली हाथ आए है हम,
खाली हाथ जाना है।
कुछ अच्छे कर्म कर लो,
बस उसी को साथ ले जाना है।।
पूरी जिन्दगी बिता दी हमनें,
झूठी शान बटोरने के लिए।
यहाँ तो आए ही है हम,
एक दिन चेतिका में लेट जाने के लिए।।
दुनिया में आते ही हमारे,
जाने का दिन तो तय है।
फिर कैसे चेतिका से ये डर,
और कैसा ये भय है।।
कर्म ऐसा करो कि,
जाने के बाद लोग करें स्मरण।
छूठे जब ये दुनिया तो,
प्रभु का ही मिले चरण।।
आए थे तो खाली हाथ,
जाने के लिए दो गज जमीन चाहिए।
फिर क्या तेरा क्या मेरा,
जिन्दगी प्रेम से बिताइए।।
सारी उम्र श्रृंगार में बिता दिए,
एक दिन कफन में जाने के लिए।
यहाँ तो आए ही है हम,
एक दिन चेतिका में लेट जाने के लिए।।
!! इति!!
"श्वेता सिंह क्षत्रीय"
जांजगीर
बहुत सुंदर रचना
ReplyDeletevery good
ReplyDeletebest kavita
ReplyDeleteBahut badiya
ReplyDeleteBadhiya
ReplyDeleteBahut sunda
ReplyDeleteउत्कृष्ट,सुंदर ����
ReplyDeleteसारांश:-जन्मत कर्म का आरंभ, मृत्य कर्म का अंत।
Bahut badhiya
ReplyDeleteBahut sundar
ReplyDelete