जिला-कोरबा, छ.ग.
विषय-चार-चिरौंजी
विधा-आलेख
शीर्षक-चार-चिरौंजी
---चार हमारे छत्तीसगढ़ का ऐसा अनोखा पेंड़ है जो जंगलों खेत खलिहानों में प्राकृतिक रुप से स्वतः ही उगे रहते हैं।
अनुमानतः आज से लगभग 40 वर्ष पहले हमारे छत्तीसगढ़ मे यह पेंड़ बहुतायत मात्रा में पाए जाते थे ।
सर्व विदित है किस तरह कहीं नगरीकरण तो कहीं फैक्टरीयों के निर्माण के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सफाया किया जा रहा है ।
अतः यह बहुपयोगी पेंड़ " चार" का पेंड़ भी कम मात्रा मे मिलते हैं ।
चार पेंड़ के फल को भी खाया जाता है । यह फल खाने में बहुत मीठा होता है , इसके फल का रंग पकने के बाद गाढे. रंग का लगभग काले रंग का हो जाता है ।
फल को चूसकर खाया जाता है । तथा इसके गुठलियों को कूटकर बीज निकाला जाता है जिसे " चार-चिरौंजी" कहते हैं ।
चार -चिरौंजी छत्तीसगढ़ का बहुत ही स्वादिष्ट एवं गुणकारी मेवा है ।
इसे खीर, हलुआ आदि विभिन्न मीठे पकवानों मे डाला जाता है , तथा गुड़ की चाशनी से इसका बहुत ही स्वादिष्ट लड्डू बनाया जाता है ।
अतः हम कह सकते हैं कि " चार-चिरौंजी " से हमारा छत्तीसगढ़ प्रसिद्ध है ।
इसके विघटन को देखते हुए हमें इसकी सुरक्षा के उपाय करनें चाहिए और छत्तीसगढ़ के अनमोल धरोहर को बचाना चाहिए ।
।।इति।।
" गोमती सिंह "
कोरबा, छ.ग.
बहुत सुंदर आलेख।
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