जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-चेतिका
विधा-कविता (मुक्त छंद)
कैसी करोना है महामारी,
क्यों लोगों ने है जंग हारी।
कराह रहे हैं चट्टान दिल भी,
रो रही हैं अब नदियाँ सारी ।
धूं-धूं करते हुए जल रहे हैं,
लाशें हैं चेतिका पर भारी।
अस्पताल शमशान बन रहे,
लाशें कह रही व्यथा सारी।
बेमौत मर रहे रोज रहगुजर,
जिंदगी पर ये मौत है भारी।
शमशान का जर्रा- जर्रा कांपता,
चेतिका की कैसी है लाचारी ।
व्यथित हैं अलविदा कह रहे,
मौत को किसने है पहचानी।
मीराआार्ची चौहान
कांकेर,छग
No comments:
Post a Comment