महासमुन्द,छत्तीसगढ़
शीर्षक:"जहाज़ हूँ मैं"
विधा -कविता (तुकांत)
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आश्रय लेता धरातल का,
पंख लगे पंछी सा आज हूँ मैं।
पवन वेग में भरता उड़ान,
मंज़िल पहूँचाता जहाज़ हूँ मैं।।
दूर सुदूर मैं उड़ता गगन में,
नये वाहनों का सरताज़ हूँ मैं।
मानवकृत अद्भुत मेरी रचना,
मंज़िल पहूँचाता जहाज़ हूँ मैं।।
आसमान की सैर करूँ या,
पानी में तैरता गजराज हूँ मैं।
मक़सद महफ़ूज़ मुक़ाम दूँ,
मंज़िल पहूँचाता जहाज़ हूँ मैं।।
तैरता समंदर पे बोझ लिए,
जलयान बन करता नाज़ हूँ मैं।
जलचर से भिड़ता चलता,
मंज़िल पहूँचाता जहाज़ हूँ मैं।।
वायु को चीरते लड़खड़ाया,
पंख लिए उड़ता परवाज़ हूँ मैं।
समय का हूँ मैं पाबंद बहुत,
मंज़िल पहूँचाता जहाज़ हूँ मैं।।
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बहुत सुंदर कविता
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