Monday, April 12, 2021

गरिमा पोयाम की रचना- संवाद

कवयित्री:-कु.गरिमा पोयाम
जिला:-कांकेर(छ. ग.)
विधा:-कविता(छंद मुक्त)
विषय:-गवेजा
शीर्षक:-संवाद

कभी सोचा है,
बिन बोले भी संवाद होता है,
भाव गलत हों तो विवाद होता है।
मूक जानवर तो देखा होगा,
वो कैसे लड़ते है?
क्या अपने तरकस में,
शब्दों के तीर रखते हैं।
जानवर कैसे समझते हैं?
हमारी भाषा।
हम कैसे समझते हैं?
उनकी अभिलाषा।
बोलने सुनने में अक्षम,
कैसे करते हैं बाते?
क्या बातें समझाने,
वाद्य यंत्र हैं बजाते।
कभी सोचा है,
बिन बोले भी संवाद होता है,
भाव गलत हों तो विवाद होता है।
ईश्वर को तो मानते ही होगे,
न देखा तो क्या हुआ,
कभी तो महसूस किया है।
कैसे समझते हो?
उनके इशारे,
क्या ईश्वर से कभी बात किया है।
जब हम बोल न पाते थे,
माँ को सब कैसे बताते थे?
माँ कैसे समझती थीं?
हमारी भाषा।
कैसे जान जाती थीं?
हमारी अभिलाषा।
तब भी हमने न बात किया था,
माँ से न संवाद किया था।
शब्दों की जरूरत न होती,
संवाद के लिए।
न शब्द जरूरी होते हैं,
विवाद के लिए।
        -कु.गरिमा पोयाम

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