Saturday, April 10, 2021

श्वेता सिंह क्षत्रीय की रचना- खगंगा

रचियता - श्रीमती श्वेता सिंह क्षत्रीय
जिला - जांजगीर चाम्पा (छ ग)
विषय - खगंगा
शीर्षक - आकाशगंगा
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आसमान में टिमटिम करती प्यारी खगंगा,
उसकी परछाई से सुन्दर दिखती हमारी बहती गंगा।
         
         न जाने इसके अंदर कितने रंग है समाये,
         दूर दूर तक इसकी सुंदरता आसमान में चमक जाए।

साँप के जैसे लहराती हुई इसकी आकार,
इसकी सुन्दरता तो देखे सारा संसार।

         दूध के जैसे है इसका रंग,
         खूब सारे तारों को रखता अपने संग।

आकाशगंगा की दो मुख्य भुजायें,
जिधर से देखो एक जैसा ही नजर आएं।

         असंख्य, तारों, ग्रहों, तत्वों, सौर मण्डल के मेल को आकाशगंगा कहते हैं,
         आकाश में जगमगाते इसकी सुन्दता को सारी दुनिया देखते हैं।

सौर मण्डल में छिपा हैं रहस्य अपार,
जितना खोजो उतना बढ़े ज्ञान का भण्डार।

         अनेक वैज्ञानिक करते है अपनी-अपनी दावा,
        सभी ने आकाशगंगा को अपने-अपने तरीके से समझाया।

       //इति//
"श्वेता सिंह क्षत्रीय"
    जांजगीर

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