जिला- कोरबा, छ.ग.
विषय-एकलव्य
विधा- आलेख
शीर्षक- गुरुनिष्ठा
----एकलव्य की गुरुनिष्ठा से कौन वाकिफ़ नहीं !!! वो तो सारे जगत में जाने जाते हैं । अंगूठा को गुरुदक्षिणा देकर भी एकलव्य के मन में गुरू के प्रति अपार श्रद्धा थी । जो सर्वथा वांछित हैं। अब हम चलते हैं कौरव -पांडव की कथा की ओर - महान गुरु द्रोणाचार्य जो त्रिकालदर्शी थे शायद उन्हे अंदेशा रहा होगा कौरव-पांडव के बीच भीषण युद्ध महाभारत होने वालि है इसलिए उन्होने अर्जुन की तीब्र ज्ञान शीतलता पर भरोसा था और वो चाहते थे अर्जुन ही श्रेष्ठ धनुर्धर होगा।
ज्ञानियों और तपस्वीयों के लिए तीनों काल प्रत्यक्ष होते हैं ।
अतः ये साबित होता है कि एकलव्य जो अपनी लगन और एकाग्रता से समस्त धनुर्विद्या हासिल किया है उसे गुरुदक्षिणा के श्रेष्ठ इतिहास बनाकर वहीं विराम दिया जाय ।
चूंकि पांडव सत्य के मार्ग पर थे और अखिल विश्व के नायक का जिनका साथ था तो विजय तो उनका निश्चित था अतःएव अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर बनना था ।
।।इति।।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
बहुत सुंदर आलेख लिखा है, गुरु और शिष्य दोनों अपनी अपनी जगह सही है।
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