सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय- एकलव्य
गुरु-शिष्य परम्परा को जिसने बढ़ाया
भारत के गौरव गाथा में अपना नाम लिखवाया
निषाद पुत्र होकर भी श्रेष्ठ क्षत्रिय धर्म निभाया
अपने महान कृत्यों से इतिहास का गौरव बढ़ाया
धनुर्विद्या देने से जब गुरु ने इंकार किया
टूटा नही साहस एकलव्य का एक क्षण भी
गण मूर्ति द्रोणाचार्य की अभ्यास स्वयं से करता रहा
श्रेष्ठ धनुर्धर बन उसने, यश,कीर्ति और
गुरु शिष्य परम्परा को मान दिया
दे अँगूठा गुरु दक्षिणा में ,एकलव्य ने
श्रेष्ठता और साहस का परिचय दिया
अंगूठा काट तीरंदाजी का नया गुर सिखलाया
मध्यमा और तर्जनी से तीर चलाने के
नए कौशल को एकलव्य ने जन्म दिया।।
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