स्थान --नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला ---जांजगीर-चांपा /छत्तीसगढ़
विधा---आलेख /कविता/ग़ज़ल
विषय--- एकलव्य
शीर्षक---- मैं हूं एकलव्य
मैं हूं एकलव्य ,अभ्यास से सीखने वाला ।
अपना इतिहास, खुद ही लिखने वाला ।
शुद्र कुल में जन्म मेरा,गुरु की मुझे तलाश थी ।
ऊंचे कुल का शरण लिया,वह किसी का दास थी ।
तिनका भी नहीं था वह, हीरा सा दिखने वाला ।
मैंने अभ्यास को गुरु बनाया, अपना मंजिल पा लिया।
गुरु से मैं आगे निकला,जग ने यह निर्णय कर ही दिया ।
नहीं था कोई भी धनुर्धर, मेरे सामने टिकने वाला ।
गुरु से भी मैं छला गया,जिनकी थी मात्र एक मूर्ति ।
साक्षात होते शायद उनकी, इच्छाओं की न होती पूर्ति ।
तन का हिस्सा अंगूठा काटकर मैं दिया दक्षिणा वाला ।
ऊंचे कुल की रीति मुझे,आज तक समझ नहीं आई ।
प्राण का अंग मांगने पर भी,उनको संकोच नहीं आई ।
ऊंचे कुल केअत्याचार का, मैं कष्ट सहन करने वाला।
ऊंचा कुल कहा गया,सच्चाई कितनी वर्णित है ।
नाम से क्या होता है उनकी कर्म तो पूरी घृणित है ।
बिगड़ चुका जो राह है वह है कभी न बनने वाला ।
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