सुन्दगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-सरहदें
हम चैन की नींद सोते हैं
चूंकि सरहदों पे जवान
रात-रात भर टहलते हैं
एहसास से ही रूह कांप जाए
उन बर्फ़ीली रातों में,दुश्मनों से
सीमाओं की रक्षा वे करते हैं।
हम आपसी संबंधों में सरहदे बना लेते हैं
भूल कर अपनी मर्यादा हदें लांघ जाते हैं
खोखले अभिमान में ही सिमट जाते हैं
रूह में उतर जाए,वो कड़वाहट घोल लेते हैं
सरहदें इंसानों की बनाई रेखा है
पशु-पक्षियों को रुकते ना देखा है
ना आसमान को बंटते देखा है
ना सागरों को कटते कभी देखा हैं
सरहदे बनाकर अपनी हदें भूलते
घुसपैठियों की बिछी लाशों को देखा है
सरहदों पे शहादत की नित नई-नई
मिशाल कायम करते शहीदों देखा है।।
Nice ��
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