रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,जिला-कांकेर, (छ.ग.)
विषय-धरा, दिनाँक-23.03.21
धरा
नमन करती हूँ,वसुधा
तुझे नमन तुझे है धरा माँ,
अपनी गोद में सबको पाला
माँ इस बात को कैसे जताऊँ माँ।
तूने जन्म,दिया,तेरी
मिट्टी ने सँवारा है,
तेरे खूबसूरत अंदाज को
कैसे बताऊँ मैं माँ।
हर माँ की माँओं को
तूने जन्म दिया,
तेरे मखमली एहसास को
कैसे मैं भूल जाऊँ माँ।
देवता ,सुर,मुनि सबको
तूने आँचल में समेटा,
दुनियाँ में सबसे खूबसूरत हो,
ये कैसे बतलाऊँ माँ।
सकल चराचर को तुमने धारा,
नदी ,पहाडों पर सब वारा,
वन्दित हो,नमनीय हो,
गर्वित है जग सारा माँ।
धरा की पुण्य धरोहर ,
सागर की गहराई हो,
पर्वत की ऊँचाई हो ,
इस बात पर मैं इठलाऊँ माँ।
तुम धैर्य हो ,साहस,प्रेम हो,
मेरी विजय की आस, उल्लास हो,
ममता की अविस्मरणीय मूरत हो
यह बात कैसे समझाऊँ माँ।
सूरज-चाँद की आलोक,जल
की शीतलता को कैसे झूठलाऊँ ,
प्रेम हो, विजय हो,बल
पराक्रम हो ये कैसे समझाऊँ माँ।
तुम सृष्टि का आगाज हो,
मधुर एहसास हो,
सौन्दर्य का क्या कहूँ,सारे गुणों को
धारे सौन्दर्य का पर्याय हो माँ।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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