Tuesday, March 23, 2021

धरा पे - पुनीत राम सूर्यवंशी

रचनाकार-पुनीत राम सूर्यवंशी 
ग्राम-लुकाउपाली छतवन 
विषय-धरा
विधा-कविता
शीर्षक-धरा पे
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निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।
     उल्लास और उमंगमय,
     रंग-बिरंगे फूलों से युक्त। 
     निसर्ग के रूप-रंग की, 
     सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।1।।
महुआ के सुमधुर-सुगंध, 
बसंत के पुरवाईयों में डूबा। 
निसर्ग के रूप-रंग की, 
सुमधुर-सुगंध है धरा पे ।।2।।
     सुमधुर पावस ऋतु की, 
     इंद्रधनुषी सुहाना पल।
     निसर्ग के रूप-रंग की, 
     सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।3।।
वादियों खोया-खोया, 
प्रकृति की मनोहारी छटा। 
निसर्ग के रूप-रंग की, 
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।4।।
     प्रपातों की मधुर-संगीत, 
     लोक कहानियों में युक्त। 
     निसर्ग के रूप-रंग की, 
     सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।5।।
वन-उपवन की शोभा, 
खिली किसलय लताएँ।
निसर्ग के रूप-रंग की, 
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।6।।
     रंग-बिरंगे फूलों से सजी, 
   बस्तर दिख रही है दुल्हन सी। 
     निसर्ग के रूप-रंग की, 
     सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।7।।
धरा की दहलीज पर, 
खड़ा है ऋतु राज बसंत। 
निसर्ग के रूप-रंग की, 
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।8।।


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