रचनाकार-पुनीत राम सूर्यवंशी
ग्राम-लुकाउपाली छतवन
विषय-धरा
विधा-कविता
शीर्षक-धरा पे
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निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।
उल्लास और उमंगमय,
रंग-बिरंगे फूलों से युक्त।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।1।।
महुआ के सुमधुर-सुगंध,
बसंत के पुरवाईयों में डूबा।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे ।।2।।
सुमधुर पावस ऋतु की,
इंद्रधनुषी सुहाना पल।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।3।।
वादियों खोया-खोया,
प्रकृति की मनोहारी छटा।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।4।।
प्रपातों की मधुर-संगीत,
लोक कहानियों में युक्त।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।5।।
वन-उपवन की शोभा,
खिली किसलय लताएँ।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।6।।
रंग-बिरंगे फूलों से सजी,
बस्तर दिख रही है दुल्हन सी।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।7।।
धरा की दहलीज पर,
खड़ा है ऋतु राज बसंत।
निसर्ग के रूप-रंग की,
सुमधुर-सुगंध है धरा पे।।8।।
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