स्थान ---नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला--- जांजगीर-चांपा /छत्तीसगढ़
विधा---आलेख कविता ग़ज़ल
विषय-- ढलैत
शीर्षक ---ढलैत और हम
देश को एक अच्छे ढलैत की जरुरत है ।
जो शिक्षा रोजगार जीवन की रक्षा करे ।
आधार भूत संरचनाओं की रक्षा से न डरें ।
संकट के हर बादल को करता रहे परे ।
ढलैत के भाग्य में रक्षा होती करता रहता ।
अविरल गंगा की तरह परहित में बहता रहता ।
उसकी दृष्टि रक्षा पर होती हुए बिना बिबश ।
रक्षा में वह प्राण जाए पीछे पग नहीं धरता ।
ढलैत न होते सत्यता की राह ही मिट जाती ।
चल पड़ती असत्यता की इतिहास कुछ बन जाती ।
उठ जाता विश्वास लोगों के विवशता दांत दिखाती ।
ढलैत है हम सुरक्षित संरक्षित है यह नहीं हो पाती ।
इसकी आवश्यकता रहेगी ही चाहे कोई भी काल ।
ढलैत है जो सुरक्षा का लेकर जलाता है मशाल ।
चाहे घर देश समाज राज्य ठौर ठौर यह चाहिए ।
है भी की स्थानों पर इन्हे मत भूल जाइए ।
शांति प्रेम भाईचारा बाद का मिलेगा अध्याय ।
प्रथम अध्याय ढलैत का है जो प्राण फूंक जाय ।
मात पिता भी गर्व करते अपने ऐसे संतानों पर ।
जीते जी सम्मान कर्तव्य का शहीद अमर कहाय ।
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