ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-आलेख
विषय- दार्शनिक एवं उसका
दृष्टिकोण
दिनाँक-13/03/2021
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दार्शनिक का अर्थ है देखना अर्थात वस्तु को समझना अस्तित्व में जो भी वस्तु है ,उस वस्तु की वास्तविकता ,यथार्थता, सत्यता और तात्विकता को समझना ही दार्शनिक कहलाता है। दार्शनिक का दृष्टिकोण सत्य को व्यक्त करना होता है। मध्यस्थ दर्शन का प्रतिपादन करने वाला श्रद्धेय नागराज जी हैं ।जिन्होंने अस्तित्ववाद मानव केंद्रित चिंतन बनाम मध्य दर्शन का प्रतिपादन किया है ।इस दर्शन में उनकी छः दृष्टियांँ है ।प्रिय,हित ,लाभ जो शरीर सापेक्ष है और न्याय ,धर्म, सत्य जो जीवन सापेक्ष है। वर्तमान में मानव जाति प्रिय, हित, लाभ में ही जीता हुआ दिखाई देता है अर्थात शरीर सापेक्ष जीना हो रहा है और न्याय, धर्म ,सत्य को प्रमाणित करना अभी बाकी है ।श्री नागराज जी का दृष्टिकोण न्याय, धर्म ,सत्य की ओर रहा है ,क्योंकि हर व्यक्ति न्याय पूर्वक जीना चाहता है और हर व्यक्ति धर्म अर्थात व्यवस्था में जीना चाहता है और सत्य में ।कोई गलती नहीं करना चाहता है ,लेकिन अज्ञातवास सही की समझ न होने से गलतियाँं होती है। अतः गलती करने के पूर्व सही को समझा जाए ,तब व्यवहार और कार्य किया जाए ,तो गलतियांँ नहीं होंगी ।ऐसा मध्यस्थ दर्शन में कहा गया है ।जो सर्व मानव के लिए कल्याणकारी है ,क्योंकि हर मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही जीवन यात्रा कर रहा है ।मानव का लक्ष्य है, समाधान ,समृद्धि ,अभय ,सहअस्तित्व इन्हीं लक्ष्यों को प्राप्त कर मानव सुख ,शांति ,संतोष ,आनंद प्राप्त कर सकता है।इसी लिए मनुष्य का जन्म हुआ है। सभी दार्शनिकों का दृष्टिकोण सर्व कल्याण हेतु ही रहता है ।समझ न पाने के कारण कुछ लोग विरोध भी करते हैं ।जो मानवीयता के विरुद्ध होता है। ऐसे विचारों को विरोध करते है। लेकिन दार्शनिकों का विचार मानवीयता ही रहता है। दार्शनिकों का विचार न्याय, धर्म ,सत्य दृष्टि रहता है। लेकिन इस की परंपरा अभी तक नहीं बन पाई है। इसी के लिए सभी मानव को प्रयास करने की समीचीन आवश्यकता है।
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उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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