Saturday, March 13, 2021

अमिताभ कुमार दीवान कृत आलेख- दार्शनिक

लेखक : अमिताभ कुमार दीवान
विषय : दार्शनिक एवं उनका दृष्टिकोण
विधा : आलेख 


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दर्शनशात्र जीवन जीने के तरीके ,उससे सम्बंधित मनुष्य का आचार व्यवहार और प्रकृतिकृत गुण है|मनुष्य को क्या होना चाहिए और मनुष्य क्या है,इन दोनों के बीच की कड़ी दर्शन है|
वस्तुतः पूंजीवाद मनुष्य को भोग विलास की ओर ले जाता है|जिंदगी हमें गाड़ी,मकान और जरूरत पूर्ण होने के बाद भी अत्यधिक धनसंचय की लालसा की ओर ले जाता है|उस कारण हम जिंदगी के उन लम्हों को खो देते हैं जो शायद आत्मिक आनन्द से हमें भरपूर कर सकती थी|अब धन संपदा का जीवन के साथ क्या सम्बन्ध है इसको एक उदाहरण के द्वारा समझा जाये|अगर भगवान किसी जीते जागते मनुष्य से कहे कि तुम्हारी आधी सम्पदा अब तुम्हारी नही रहेगी बदले में तुम्हें दस मिनट की जिंदगी ज्यादा दी जाएगी|अधिकांश व्यक्ति इसको ठुकरा देंगे क्योकि जीवित व्यक्ति के लिए दस मिनट अधिक की जिंदगी मायने नहीं रखती|अब यदि वही व्यक्ति मर चुका है उससे भगवान पूछे कि तुम्हारे नाम की पूरी सम्पति लेकर मैं तुम्हें दस मिनट के लिए जिंदा कर सकता हूँ तो वही व्यक्ति दस मिनट के लिए क्या एक सांस भर की जिंदगी के लिए सारी दौलत कुर्बान करने को तैयार हो जाएगा|मतलब साफ है जिंदा रहते तक जिंदगी के वास्तविक उद्देश्य पता नही चल पाते,मृत्यु के अत्यंत निकट आने पर पछतावा होता है और इंसान असंतुष्ट मरता है|जिंदगी भले कष्टपूर्ण हो लेकिन मृत्यु मन से शुकुनदायक है|पूर्णतः स्वस्थ होने पर भी यदि बिस्तर में आँखे नींद को तरसे| नींद के लिए शराब और नींद की गोलियों की जरूरत पड़े तो समझ जाइये आपके जीने के तरीके में कोई ना कोई गड़बड़ी अवश्य है| ये सत्य है कि जीवन चलाने के लिए धन की जरूरत होती है पर ये भी सत्य है कि जिंदगी केवल धन कमाने के लिए नहीं है| प्रकृति से जुड़िये ,प्रकृति का आनन्द लीजिए|ऐसा कौन सा रँग है जीवन का जो प्रकृति में नही है| सरल रहिये और किसी के सुख का कारण यदि आप नहीं बन सकते तो कम से कम किसी के दुःख का कारण ना बने|

अमिताभ कुमार दीवान 

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