जिला:-कांकेर(छ. ग.)
विधा:-आलेख
विषय:-दार्शनिक एवं उसका दृष्टिकोण
शीर्षक:-"हर वो व्यक्ति दार्शनिक है।"
दार्शनिक का अर्थ होता है देखने वाला।यहां देखने से आशय किसी विषय वस्तु को देखकर अपना दृष्टिकोण बनाने से है।वो व्यक्ति दार्शनिक हो ही नहीं सकता जो दूसरे की बुद्धि या दूसरे के विवेक पर निर्भर हो।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था-"अगर दूसरे की बुद्धि से ही चलना होता तो ईश्वर हमें स्वयं का मस्तिष्क न देते।"इस उद्धरण को देने का स्वामी जी का कोई भी कारण रहा हो।पर मुझे लगता है यहाँ उन्होंने दार्शनिक का अर्थ स्पष्ट कर दिया है।हमें अपने चारों ओर दूसरे की बुद्धि और दूसरे के विवेक से चलने वाले कई लोग मिल जाएंगे।पर दार्शनिक वही है जो अपने नजरिये से जीवन को देखे।जिसका अपना जीवन दर्शन हो।
मेरे हिसाब से तो हर विवेकी व्यक्ति दार्शनिक ही है।हर वो व्यक्ति जो जीवन की किसी विषय वस्तु को अपने नजरिये से देखे।उस पर एक तर्क सम्मत निर्णय ले सके और उस विषय पर अपने स्वयं के विचार दे सके।जिसने जीवन के हर पहलू को अपने नजरिये से देखा व परखा हो और अपनी राय दी हो। वो दार्शनिक है।ये मेरे अपने विचार हैं जो मेरी सोच के दायरे तक सीमित हैं और आपको सही या गलत लग सकते हैं।-कु.गरिमा पोयाम
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