रचनाकार-अमिताभ कुमार दीवान
जिला-रायपुर छतीसगढ़
विषय-धरा
विधा-कविता
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देख ये नदियाँ, ये पर्वत ,ये मैदान ,कितना हरा भरा है|
महसूस कर के देखिए ,पूर्णतः परिपूर्ण ये धरा है|
तेरे माथे सा हिमालय,तेरे रंगों सी उजली हिम चादर,
घूँघट में हरी साड़ी लपेटे,तू लगती मुझे वसुंधरा है|
बढ़ती है दिल की धड़कन,जैसे धरती में मनता सावन,
उठती है सीने में लहरे ,जैसे उठता समंदर में लहरा है|
तुझ सी प्यारी धरती है ,जब जैसे माथे में सेहरा है,
क्यों नही सुनता मानव पुकार,क्या तू बिल्कुल बहरा है|
स्त्री, प्रकृति,धरती ये जीवन के हैं अंग अमित,
इनको नुकसान पहुचायेगा जो ,समझो वो मरा है|
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