Wednesday, March 17, 2021

लीलाधर कुम्हार की रचना- फागुन

रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)
विषय - फागुन
विधा - छंद मुक्त काव्य
शीर्षक - फागुन महीना
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      //फागुन महीना //

बसंत ऋतु का फागुन महीना ।
सिखलाता है कैसे जीना ??
ढोल नगारे खुशी उमंग ।
होली के पिचकारी संग ।।
भूल के सारे भेदभाव ।
सबके लिए दिल में सद्भाव ।।
नाचो कूदो मस्ती में ।
धमाचौकड़ी बस्ती में ।।
कर लो जरा शरारत जी ।
घर से कहाँ नदारद जी ??
जैसे कष्टों से बचे प्रह्लाद ।
हरि भक्ति से हुए आबाद ।।
ऐसे ही प्रभु सबके सहारे ।
हर दिल मे उसका ही नजारे ।।
मन की गाँठे खोलो यार ।
कर लो सबसे प्रेम व्यवहार ।।
प्रकृति कैसी सजी - धजी है !
नव प्रभात की धूम मची है ।।
फागुन में शिवरात्रि आती ।
शिव शंकर की पूजा आरती ।।
लाल - लाल टेसू के फूल ।
विरहिणी के लिए मानो शूल ।।
खट्टे - मीठे अमराई के फल ।
तुलसी नीम के पत्ते खा चल ।।
तन - मन स्वस्थ रहेगा तेरा ।
फागुन में नित नूतन सबेरा ।।
आनन्द और उल्लास मधुरता ।
मादक महुआ रोज टपकता ।।
वातावरण सुहावन लगते ।
क्षण - क्षण प्रकृति चमकते दमकते ।।
भारतीय नए वर्ष का सूचक ।
फागुन माह का रंग आकर्षक ।।
करती है श्रृंगार वसुन्धरा ।
नव पत्ते फल फूल सुनहरा ।।
परिवर्तन का दौर है फागुन ।
अच्छे - अच्छे शुभ शगुन ।।
जीवन मे रस बरसाती है ।
फागुन माह सबको भाती है ।।

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