Wednesday, March 17, 2021

द्रोपती साहू "सरसिज" की रचना- फागुन

द्रोपती साहू "सरसिज"
महासमुन्द, छत्तीसगढ़ 
       शीर्षक- फागुन म मोर मन...
            विधा-गीत
              *****
मया अउ पीरीत के करार होगे।
फागुन म मोर मन मतवार होगे।।

मन हा सबो के हरियागे,
      जम्मों झन हा भंगियागे।
अपने अपन हाँसय रोवय,
     नाचत गावत फागुन आगे।।
रंग म रंगे घर दुवार होगे,फागुन म मोर.......

बबा पहिरे हावय लुगरा,
       बाबू घुमत हावय उघरा।
जम्मों दिखय खदभुसरा,
      ममादाई मटकय मुड़उघरा।।
पिचका के रंग धारेधार होगे, फागुन म मोर.....

आनी बानी मुंहूँ ल बनाए, 
        बाला टोपी चसमा लगाए।
राहस नाचय लुगरा पहिरे,
        फगवा गावय रंग उड़ाए।।
नंगारा बजई हा बेहार होगे, फागुन म मोर.......

जिनगी हावय चारदिनिया,
       तोर डेरा हावय घरघुंदिया।
दया मया के धर ले मोटरा,
      दुख सुख रात अउ बिहनिया।।
जाँगर जिनगी के अधार होगे,फागुन म मोर …..
मया अउ पीरीत के करार होगे।
फागुन म मोर मन मतवार होगे।।
            *****
              

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