स्थान ---नवापारा खुर्द/ सक्ति
जिला-- जांजगीर-चांपा /छत्तीसगढ़
विधा---आलेख कविता ग़ज़ल
विषय--- फागुन
शीर्षक --फागुन की चर्चा
किसी की चर्चा हो न हो, फागुन की चर्चा होती है ।
जल की वर्षा हो न हो, रंगों की वर्षा होती है ।
साथ साथ सब भीगते है
एक जैसे सब दिखते हैं
बैर भाव सब मिटते हैं
प्रेम ही यहां टिकते हैं ।
किसी पर खर्चा हो न हो, फागुन पर खर्चा होती है ।
हर हाथ में रंग होते।
हर हाथ गुलाल होते ।
हर तन मन दिखता रंगीला ।
हरे पीले लाल गाल होते ।
किसी दिन मजाक हो न हो,इस दिन मजाक होती है ।
नारी भी रंगीन रहते हैं ।
पुरुष भी रंगीन रहते हैं ।
बूढ़े बुढ़िया भी रंगीन रहते हैं ।
बच्चे भी रंगीन रहते हैं ।
किसी दिन रंगीन हो न हो,इस दिन रंगीन होती है ।
फाग गाते जाते हैं ।
नंगाड़ा बजाये जाते ।
सुर कबीर के दोहे चलते हैं ।
गा गाकर सब मचलते हैं ।
किसी दिन मचलना हो न हो,इस दिन मचलना होती है ।
आम बौराये और फलते हैं ।
फूलों से लबालब पलाश दिखते हैं ।
महुआ भी फूल से लदते है ।
धरती भी सुंदर लगती है ।
किसी माह फूलना फलना हो न हो इस माह जरुर होती है ।
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