स्थान -नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला -जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
विधा---आलेख/ कविता/ ग़ज़ल
विषय ---नींद
शीर्षक-नींद
व्यर्थ नींद का
त्याग मुझसे,
हो जाए हो जाए ।
जितनी जरुरत मुझको,
मिल जाए
वह मिल जाए।
नींद का पहलवान मुझे,बनना नहीं है ।
कुम्भकरण जैसी मेरी तमन्ना नहीं है ।
काम हो जिससे मेरी
दिन चल
जाए चल जाए ।
नींद की पहाड़ से ,दुनियां परेशान हैं ।
वो मुझसे रहे दूर, हार्दिक अरमान है ।
जागने वाला बन जाऊं
यह गीत
मन गाए मन गाए ।
नींद की महासागर में ,तैरने वाले तैरते रहे ।
मैं किनारे ही ठीक हूं, इतना समझते रहे ।
इन्तजार न
मुझे कभी भाता
और न करीब आए ।
नींद को भगाने का योग नहीं करना है ।
बाबा रामदेव को मुझे नहीं समझना है ।
मेरे मन में
यह बात
घर कर जाए घर कर जाए ।
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