जिला - कोरबा ,छ.ग.
विषय- निराकार
विधा- छंद मुक्त कविता
शीर्षक-निराकार
-------जिनका नहीं कोई स्वरुप, नहीं कोई आकार है ,
हाँ वही परमब्रम्ह निराकार हैं ।
फिर भी संचालित करते वही सारा संसार हैं ,
हाँ वही निराकार हैं।
करने को न कर हैं उनके,
न ही उनके पद हैं !
फिर भी करते वो ,
लीला विविध प्रकार हैं ।
हाँ वही परमब्रम्ह निराकार हैं ।
वो दिव्य, अलौकिक , अगम ,अगोचर ,
उनमें समाहित समस्त चराचर हैं ,
हाँ वही परमब्रम्ह
निराकार हैं ।
जिनकी इच्छा के बिना, नहीं खिलते पादप में फूल हैं ,
हाँ वही मंगलकारी
संपूर्ण जगत के मूल हैं ।
अखिल विश्व ब्रम्हांड के वही कारण करण हैं ,
हाँ फिर भी वो निराकार हैं ।
योगी, तपस्वी, त्यागी भी नहीं पाते
जिनके पार हैं ,
हाँ वही निराकार हैं।
कण-कण में ब्याप्त ,
पर रहते सदा लुप्त हैं ।
भाव में वो बसते सदा , यही उन्हें पाने का एक प्रमुखआधार है
हाँ वो निराकार हैं।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
बहुत सुंदर कविता
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