विषय -विनाह
रचनाकार सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक -धर्म और संस्कृति विनाह सी है
ना कुछ दिखता है सामने पर एक रुकावट सी है।
जिंदगी जी रहे है लेकिन माथे पर थकावट सी है।
सोचते है उस पर निकल पड़े आगे जो दूर सी है।
छोटी सोच रोक देती है जो लोगो की भीड़ सी है।
बेपरवाह हो चले तो क्या धर्म तो सी है।
जो सही रास्ते पर चलाये ये एक कर्म सी है।
चलते चलते जी लेना है पूरी जिंदगी जो एक फूल सी है।
यहाँ से ले जाना कर्म ही है सब लेकर जायेंगे ये भूल सी है।
बुरे कर्मो को करने से रोकना सुविचार ये सतकर्म सी है।
धर्म और संस्कृति बचाते मानव मूल्यों को जो विनाह सी है।
रचनाकार -सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
No comments:
Post a Comment