रचनाकार-गोमती सिंह
जिला - कोरबा, छ.ग.
विषय-मोक्ष
विधा - आलेख
शीर्षक- मोक्ष
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सामान्य जनमानस के आधार पर देखा जाए तो मोक्ष का अर्थ संसार चक्र - अर्थात जन्म-मृत्यु से छुटकारा पाना से लगाया जाता है।
लेकिन अध्यात्म की गहराई में गोता लगाएं तो मोक्ष को परिभाषित करना मैं समझती हूँ कि यह असंभव प्रयास है ।
अपनी निम्न बुद्धि या अल्पज्ञान से ये कह सकती हूँ, कि मोक्ष का अर्थ मनुष्य की उस अवस्था से लगाया जा सकता है जिससे वह संसार के समस्त द्वंद जैसे - सुख-दुख , अपना-पराया , मान- अपमान , ईर्ष्या द्वेष , लाभ-हानि इस तरह के सभी अवस्थाओं से जिस ब्यक्तित का का मन मस्तिष्क ऊपर ऊठ चुका होता है ऐसी स्थिति को प्राप्त मनुष्य मोक्ष का भागीदार कहा जा सकता है ।
इस अवस्था को प्राप्त कर लेने से जीव संसार में रहते हुए भी मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है ।
वह जीवात्मा संसार के सभी द्वंद से परे हो जाता है ।
अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेता है निर्वाणित हो जाता है ।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
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