स्थान : रायपुर छतीसगढ़
विषय : विनाह
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मोहब्बत में तेरे दर पर, कैसा ये गुनाह है|
चलती है जिंदगी मेरी ,तू ही मेरी विनाह है|
शुकूँ नहीं देते मुझे ,पाबंदियाँ गलियों की,
गुजरूं जो तेरे घर से, वहीं मेरी पनाह है|
मैं समंदर की गर्जना हूँ ,नीरवता बेचैनी लिए,
समा लूँगा खुद में तुझको,ऐसा तुझे आनाह है|
तेरी आहट नहीं होती ,तो तरसता हूँ लफ्जों को,
साँसे रुकने लगती है जैसे,हो रहा मुझे अनाह है|
साथ लगता है इतना प्यारा ,ऐसे अमित को,
जैसे मैं हूँ कुँआ ,और मुझे घेरे तू ही मेरी विनाह है|
अमिताभ कुमार दीवान
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