Wednesday, March 10, 2021

अमिताभ कुमार दीवान की रचना- विनाह

रचनाकार :अमिताभ कुमार दीवान
स्थान : रायपुर छतीसगढ़
विषय : विनाह

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मोहब्बत में तेरे दर पर, कैसा ये गुनाह है|
चलती है जिंदगी मेरी ,तू ही मेरी विनाह है|

शुकूँ नहीं देते मुझे ,पाबंदियाँ गलियों की,
गुजरूं जो तेरे घर से, वहीं मेरी पनाह है| 

मैं समंदर की गर्जना हूँ ,नीरवता बेचैनी लिए,
समा लूँगा खुद में तुझको,ऐसा तुझे आनाह है|

तेरी आहट नहीं होती ,तो तरसता हूँ लफ्जों को,
साँसे रुकने लगती है जैसे,हो रहा मुझे अनाह है|

साथ  लगता है इतना प्यारा ,ऐसे अमित को,
जैसे मैं हूँ कुँआ ,और मुझे घेरे तू ही मेरी विनाह है|


अमिताभ कुमार दीवान

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