संबलपुर,जिला-कांकेर, (छ. ग.)
विषय- विनाह
दिनाँक-10.03.21
विनाह
कुएं से जल पाना,
बन गया गुजरा जमाना,
विनाह को कोई कैसे जाने,
मुश्किल है समझना।
सबकी प्यास बुझाता जल
सुरक्षित रहे,अतःविनाह लगाता,
कुएं के जगत पर ही
हर कोई प्यास बुझाता।
जल ही जीवन है,
जल की रक्षा करना है जरूरी,
सुरक्षित जल रहे ढँक कर
रखना होती थी मजबूरी।
शुद्ध, स्वच्छ जल विनाह
ही रख पाता,जालीदार
विनाह ही अमृत से
रवि किरण था पहूँचाता।
कुएं और विनाह की
हो रही अब बिदाई,
बीते लम्हों की विनाह बन
कर रह गई परछाई।
कुएं पर जगत और विनाह थी
बुजुर्गों की बुद्धिमत्ता का प्रतीक,
हर बातों में वैज्ञानिकता
को करते थे अंकित।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर, (छ .ग.)
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