रचनाकार - संतराम कुम्हार
जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - मोक्ष
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " शिव ही मोक्ष हैं "
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देवों के देव, महादेव कहलाते हैं।
अलख निरंजन, धुनी कहाँ रमाते हैं।
दूध,धतूरा,बेलपत्र, श्रद्धा से हम चढ़ाते हैं।
मन मंदिर में हम,शिव जी की मूरत बसाते हैं।।
शिव ही शक्ति, शिव ही भक्ति,
शिव ही ओंकार हैं।
शिव ही सत्य, सत्य ही शिव,
शिव ही मोक्ष के द्वार हैं।।
नीलकंठ कहलाते, पीते हैं विष का प्याला।
हाथ में कमंडल सोहे,गले में सर्प की माला।
ताण्डव नृत्य करते भोले, त्रिनेत्र में है ज्वाला।
जनम-मरन के फेरे से,जिसने तुम्हें निकाला।।
शिव ही आदि, शिव ही अंत,
शिव ही महाकाल हैं।
शिव ही चन्द्रमा, शिव ही सूरज,
शिव ही आकाश-पाताल हैं।।
तेरी भक्ति का प्रभु, निशदिन गान करता हूँ।
ओम नमः शिवाय हरदम, मन में मैं जपता हूँ।
भस्म बनकर मैं नाथ, तन में तेरे चढ़ता हूँ।
तेरे अंश में विलीन हो,तेरा ही अंश बनता हूँ।।
शिव ही भूत, शिव ही भविष्य,
शिव ही वर्तमान हैं।
शिव ही ब्रह्मा, शिव ही विष्णु,
शिव ही सर्वशक्तिमान हैं।।
सबकी विनती सुनने वाले,भोले भंडारी हो।
दुष्टों का नाश करने वाले, तुम त्रिशूलधारी हो।
कैलाश पर्वत में रहने वाले,तुम जटाधारी हो।
अर्धनारीश्वर हे शिव,तुम पुरुष और नारी हो।।
शिव ही तपस्या, शिव ही मोक्ष,
शिव ही तारनहार हैं।
शिव ही दया, शिव ही धर्म,
शिव ही प्रेमपुकार हैं।।
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