Tuesday, March 2, 2021

डिजेन्द्र कुर्रे"कोहिनूर" की रचना- पलाश

रचनाकार - डिजेन्द्र कुर्रे"कोहिनूर"
जिला - बलौदाबाजार(छत्तीसगढ़)
विषय - पलाश
विधा - गीत  
★★★★★★★★★★
    पलाश के फूल
★★★★★★★★★★
उस पर सजना दूर रहे तो,
कहा जगत यह भाता हैं।
मन में प्रेम हिलोरें लेता,
जब बसंत आ जाता है।
★★★★★★★★★★
मदिर-मदिर पुरवाई चलती,
जब-जब यह सिहरन वाली।
फल-फूलों से लद जाती है,
तरु लता की हर डाली।
कोयलिया जब राग बसन्ती,
मधुरिम सुर में गाती है।
और याद प्रियतम की मन को,
सैने से बहकाती हैं।
बिन सजना के मन मंदिर में,
दुख बदरा छा जाता है।
मन में प्रेम हिलोरें लेता,
जब बसंत आ जाता है।
★★★★★★★★★★
रंगों की इस मौसम में जब,
गोपियाँ की मन खिलती है।
पलाश फूल को देख-देख,
मन मस्त मन मचलती है।
सजनी अब साजन को मिलने,
कैसी तन मन अकुलायी है।
जैसे भौरें गुन-गुन करते,
मादकता फूल लहराई है।
लाल पीला जब लगे गाल में,
रंग बिरंग हो जाता है।
मन में प्रेम हिलोरें लेता,
जब बसंत आ जाता है।
★★★★★★★★★★
डिजेन्द्र कुर्रे "कोहिनूर"
पीपरभावना (छत्तीसगढ़)

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