जिला - बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)
विषय - दार्शनिक एवं उनका दृष्टिकोण
विधा - आलेख
शीर्षक - आदि शंकराचार्य : एक महान दार्शनिक
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//आदि शंकराचार्य : एक महान दार्शनिक//
हमारे भारत देश के ऋषि , मुनि , संत , सद्गुरु आदि महापुरुष बड़े ही दार्शनिक , विचारक , तत्वचिंतक एवं धर्मनिष्ठ रहे हैं । इन भारतीय मनीषीयों के आगे प्लेटो , सुकरात , एमर्सन , थोरो , पाइथागोरस आदि दार्शनिक जुगनू के सदृश प्रतीत होते हैं । उनका दर्शन मन व बुद्धि तक सीमित है जबकि भारतीय दर्शन मन , बुद्धि व प्रकृति से पार सूक्ष्मातिसूक्ष्म है , सार्वभौमिक है व अकाट्य है । भारत के महान दार्शनिकों की श्रृंखला में जगद्गुरू आदि शंकराचार्य जी का नाम आज भी बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है ।
जीवन परिचय :-
वर्तमान केरल के कालड़ी नामक ग्राम में 788 ई. में बालक शंकर का जन्म हुआ था । ब्राम्हण दम्पत्ति आर्यम्बा व शिवगुरु के परिवार में जन्मा यह बालक 32 की अल्पायु में ही संसार से चले गए । भगवत्पाद गोविंदाचार्य जी इनके गुरू थे । इन्होंने भारतवर्ष के चारों दिशाओं में चार धार्मिक मठों की स्थापना की । उत्तर में ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम , दक्षिण में श्रृंगेरी पीठ , पूर्व में गोवर्धन पीठ और पश्चिम में शारदा पीठ । इन पीठों के माध्यम से इन्होंने सत्य सनातन हिन्दू धर्म को मजबूत किया और अन्य तत्कालिक धर्मों के अवांछनीय व विकृत प्रभाव को कम करने का प्रयास किया । मण्डन मिश्र जैसे धुरंधर पण्डित को शास्स्त्रार्थ में पराजित किये । ब्रम्हसूत्र , उपनिषद आदि पर इन्होंने अनेक भाष्य लिखे । विवेक चूड़ामणि , अपरोक्षानुभूति जैसे कई तात्विक दर्शन शास्त्र की रचना किये । ये संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे ।
दार्शनिक दृष्टिकोण :-
पूज्यपाद शंकराचार्य जी महाराज अद्वैतवाद के प्रवर्तक थे । अद्वैत वेदान्त दर्शन ही सबका सार है । एकोअहं द्वितीयोनास्ति , सर्वं खल्विदं ब्रम्ह , अहं ब्रम्हास्मि आदि महावाक्य उनके दार्शनिक सिद्धांत का सूत्र है । अर्थात् यह सारी सृष्टि , सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड एक ही परम सत्ता , एक ही ईश्वर या एक ही ब्रह्म का पसारा है , उसी का विलास है , उसी का स्वरूप है । इसी को एकात्मवाद या ब्रम्हात्मैक्यवाद भी कहते हैं । चारों वेद , वेदान्त ग्रन्थ , उपनिषद , गीता एवं पुराणों का मूल तात्पर्य यही है कि -
" सबमें एक एक मे सब , एकहिं एक समाहिं ।
प्रथम प्रथम नहीं दूसरा , कौन किसे झुठलाहिं ।। "
सारांश यह है कि पृथ्वी ,जल , अग्नि , वायु ,आकाश ,मन , बुद्धि व अहंकार ये अष्टधा प्रकृति जड़ , असत् , नाशवान एवं परिवर्तनशील है जबकि इनसे पृथक सबका आधार व मूलस्वरूप परमात्मा ( आत्मा , ब्रम्ह , ईश्वर आदि ) सत् , चेतन ( ज्ञानस्वरूप ) , आनन्द रूप , अजन्मा , अविनाशी व सर्वव्यापक है । ब्रम्ह ही सत्य है , जगत मिथ्या है । सारे सिद्धांत , सारी फिलॉसॉफी , सारी मान्यताओं का समापन अद्वैत में हो जाता है । यही आदि शंकराचार्य जी का दार्शनिक दृष्टिकोण है ।
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