जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - पलाश
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " पलाश का आगमन "
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बहार बसंत की आई है।
पलाश की फूल खिल आई है।
गर्मी साथ में लाई है।
वन में खुशबू महकाई है।।
मन को भाते सबका,इसका लाल रंग।
गिलहरियों का ढेरा रहता, हमेशा इनके संग।
मिलन होली की आई है।
प्राकृतिक रंग इसकी मैंने बनाई है।।
सुन्दरता उपवन की, जंगल की आग कहलाती है।
टेसू, ढाक प्रचलित नाम,गीत प्रेम की गाती है।
औषधीय गुण भरपूर बताई है।
शारीरिक विकार दूर करते आई है।।
धार्मिक अनुष्ठानों में लकड़ी इनकी,
यज्ञ में जलाई जाती है।
वातावरण को पवित्र करती,
चर्म रोग दूर भगाती है।।
गुण अनगिनत इनकी गिनाई है।
सुकुन भरा पलाश की परछाई है।।
फूलों से देखो, डालियाँ लदी है।
मानो लाल रंग में, दुल्हन सजी है।
इत्र प्रकृति ने लगाई है।
कितना सुन्दर पलाश मुस्काई है।।
प्रेमिका को प्रेमी मिलन की आस है।
प्रेम रस घोलता ये वनफूल पलाश है।
मधुरम,मनोहर और सुखदाई है।
प्यार की ज्योति इसने जलायी है।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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